Friday, 12 July 2013

साक्षी तुम

देखते हो राख उडती है 
कैसे कुहरे  पर जमती है 
सहम कर चाँदनी 
  ठिठक  गयी बुझते पलो  में 
   जिला दो फिर एक स्पर्श में 
निचोड़ दो धुएँ को 
पर बरसो कैसे भी 
व्योम डरते हो यूँ भी  
  मिटते ही हो बह ही चलो 
चलो आज मिल ही लो 
फिर स्मृति पथ पर हो लो 
रहता अब जहाँ कोई नहीं पर 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम

भागूं भागती रहूँ 
      शिराये उबलकर 
                 बह पडे .......
चीखूँ निशब्ध  गुंजा दूँ 
फेफड़े फटकर 
          भिखर पड़े 
पर तुम मत आना 
   डूब जाओगे खारे  सागर में
   खो जाओगे अंधियारे में 
   जुलस जाओगे , अरे ठहरो 
    दहकते प्रश्नों के गलियारे में 
          वहाँ भी पर 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम

वसुधा धधक रही है 
   व्योम कहा हो 
पयोधर फिर झरो 
         झर झर 
पिघलो , झरो , मिटो 
वसुधा में घुलो 

भरो, दरारों में तुम हां 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम


To be continued...

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