देखते हो राख उडती है
कैसे कुहरे
पर जमती है
सहम कर चाँदनी
ठिठक गयी बुझते पलो में
जिला दो फिर एक स्पर्श में
निचोड़ दो धुएँ को
पर बरसो कैसे भी
व्योम डरते हो
यूँ भी
मिटते ही हो बह ही चलो
चलो आज मिल ही लो
फिर स्मृति पथ पर
हो लो
रहता अब जहाँ कोई
नहीं पर
साक्षी तुम रहना
कवेल तुम
भागूं भागती रहूँ
शिराये उबलकर
बह पडे .......
चीखूँ निशब्ध
गुंजा दूँ
फेफड़े फटकर
भिखर पड़े
पर तुम मत आना
डूब जाओगे खारे सागर में
खो जाओगे अंधियारे में
जुलस जाओगे , अरे ठहरो
दहकते प्रश्नों के गलियारे में
वहाँ भी पर
साक्षी तुम रहना
कवेल तुमवसुधा धधक रही है
व्योम कहा हो
पयोधर फिर झरो
झर झर
पिघलो , झरो , मिटो
वसुधा में घुलो
भरो, दरारों में तुम हां
साक्षी तुम रहना कवेल तुम
To be continued...
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