Thursday, 11 July 2013

प्रतीक्षा - 2 (07-11-04)

नियति है,
             विड़म्बना है 
आबद्ध रह पीड़ा सहनी  है 
     मौन को सहेज रख 
पल पल जीना है 
प्रतीक्षा को 
पर जो भी हो 
वह है तो  तेरी है 
केवल तेरी 

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