Monday, 8 July 2013

प्रतिक्षा में तुम्हारी (29-3-1996)

रीति की श्रंखलाओ में आबद्ध रहा हूँ
बंधन अब ये स्वीकार नहीं 
जन्मो से पीड़ा सहता रहा हूँ
 पीड़ा अब ये स्वीकार नहीं  
तेरी स्वीकृति की प्रतिक्षा में 
मैं सव्यं हुआ  निरुतर 

स्वीकृति समझूँ क्या तेरे मौन को 
इन अधरों को अब तो खोल दो 
और कर लो तुम स्वीकार 
जन्मो से मैं तुम्हारा रहा हूँ 
रही हो जन्मो से तुम मेरी 
कह दो बस तुम इतना ही 
की तुम मेरी हो बस मेरी 

1 comment: