Saturday, 20 July 2013

गुल रही चहक

धड़कन की खनक 
     साँसों की महक 
आचँल  में छिपाए 
            गुल रही चहक 

पंख पसराए 
            नभ में छाए 
मधुर रंगीले 
             गीत गुन  गुनाए 

भोर चढ़े जो 
               नीड़ छोड़े 
भूले भटको की 
              साँस फिर जोड़े 

मिलने की चाहत 
                 बिछोह की कसक 

अहसास से परे 
             गुल रही चहक      
  
                                      23-06-1999


अनजान थी चहक थी 
सुख की खनक थी   
             अब भिखरे तिनके 
उखड़े पंख , भटका सूरज 
        गिरते तारे जलता जग 
सुलगती धरती , टूटा आकाश 
          भिखरा नीड़    

धूप

खिड़की  की जाली  से छनकर देवदूत  सी आयी धूप 
शायद मेरे लिए ही इस कमरे में उतर आई धूप 
सीलन भरे कमरे को ताजगी से भरने आई धूप 
मेघो  को छूकर और निखर आई धूप 
हर शाख  हर पंख पर झिलमिल लहरायी धूप 
खिड़की  की जाली  से छनकर देवदूत  सी आयी धूप
शायद मेरे लिए ही इस कमरे में उतर आई धूप 
                               
                                                               03-07-1999


और फिर एक दिन दरवाजे से भीतर आयी धूप
सुनहरी कुछ उजली निर्मल आशीष सी धूप 
पल भर ठिठ्की रोम रोम में समायी धूप 
बंद पड़ी वसुधा को पुलका गयी धूप
जीवन की हलचल गर्भ में भर गयी धूप 
और फिर तम बिखेरती जाने कहाँ चली गयी धूप 
कभी न लौट के आने को भटका कर चली गयी  धूप 

                                                                29/11/2004

आकाश


मेरे आकाश कहाँ हो तुम 
  आओ समेट कर ले जाओ मुझको 
मैं भी बरसूँ 
        सिचूँ स्वयं ही को 

मेरे आकाश 
      मुझे घुलने दो स्वयं में 
कि जीवन वहाँ है 
             तुम जहाँ हो 
जीने दो स्वयं में 

Promise

Bless me joy,
         you Promised ....

Roll me in your arms
     Oh its your smell ,
           I wanna breathe

These are your wings,
        I am flying with,

Baby shelter me,
          bring me home,

U promised.....

Friday, 12 July 2013

साक्षी तुम

देखते हो राख उडती है 
कैसे कुहरे  पर जमती है 
सहम कर चाँदनी 
  ठिठक  गयी बुझते पलो  में 
   जिला दो फिर एक स्पर्श में 
निचोड़ दो धुएँ को 
पर बरसो कैसे भी 
व्योम डरते हो यूँ भी  
  मिटते ही हो बह ही चलो 
चलो आज मिल ही लो 
फिर स्मृति पथ पर हो लो 
रहता अब जहाँ कोई नहीं पर 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम

भागूं भागती रहूँ 
      शिराये उबलकर 
                 बह पडे .......
चीखूँ निशब्ध  गुंजा दूँ 
फेफड़े फटकर 
          भिखर पड़े 
पर तुम मत आना 
   डूब जाओगे खारे  सागर में
   खो जाओगे अंधियारे में 
   जुलस जाओगे , अरे ठहरो 
    दहकते प्रश्नों के गलियारे में 
          वहाँ भी पर 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम

वसुधा धधक रही है 
   व्योम कहा हो 
पयोधर फिर झरो 
         झर झर 
पिघलो , झरो , मिटो 
वसुधा में घुलो 

भरो, दरारों में तुम हां 
साक्षी तुम रहना कवेल तुम


To be continued...

Thursday, 11 July 2013

अंतहीन खोज (08-12-2004)

खोज अंतहीन खोज 
महीन किरणों के जालो में 
निर्जन हर पथ में 
मोर के निर्मल निशब्द में 
निःशब्द के संगीत में 
खोज अंतहीन खोज 
विचारो में भावो में 
साँसों से उठते बवंडरो में 
ताल कोटर ठहरे हर 
                 पानी में 

खोज  अंतहीन खोज 
हर पल हर आयाम में 
संध्या सवेरे के गान में 
दीप के प्रकाश में तम  में 
खोज  अंतहीन खोज 

पिघले मन में 
छलकते आँसू  में 
रेट के कतरों में 
पानी की ललकारो में 
खोज अंतहीन खोज 

प्रतीक्षा - 2 (07-11-04)

नियति है,
             विड़म्बना है 
आबद्ध रह पीड़ा सहनी  है 
     मौन को सहेज रख 
पल पल जीना है 
प्रतीक्षा को 
पर जो भी हो 
वह है तो  तेरी है 
केवल तेरी